गुरु दत्त: वर्तमान में रहकर वक्त से आगे की सोचने वाले फिल्मकार

By:चंदन सिंह राजपूत

आज 10 अक्टूबर है. आज ही के दिन हिंदी सिनेमा के मशहूर फिल्मकार गुरु दत्त इस दुनिया को छोड़ दिया था. महज 39 साल की छोटी सी उम्र में उनकी मौत हो गई थी. आज छह दशक से ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी उनके छोड़े खालीपन को कोई भर नहीं सका है.

गुरु दत्त का फिल्मी सफर बेहद दिलचस्प रहा. उन्होंने 1940 के दशक में प्रभात स्टूडियो में कोरियोग्राफर और असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर शुरुआत की थी.

इसके बाद 1951 में उन्होंने अपने दोस्त देव आनंद के साथ मिलकर 'बाजी' बनाई, जिसने हिंदी फिल्मों में शहरी क्राइम-थ्रिलर का एक नया ट्रेंड शुरू कर दिया. फिर 'आर-पार', 'मिस्टर एंड मिसेज 55' और 'सी.आई.डी.' जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने साबित किया कि वे आम दर्शकों की नब्ज बखूबी पहचानते हैं.

लेकिन गुरु दत्त एक कामयाब निर्देशक भर बनकर संतुष्ट नहीं थे. 1957 में उन्होंने 'प्यासा' और 1959 में 'कागज के फूल' जैसी फिल्में बनाई. इन फिल्मों के काफ्ट को लेकर आज भी सिनेमा जगत में बात होती है. कई फिल्म संस्थानों में तो गुरु दत्त की फिल्मों को फिल्म मेकिंग में पढ़ाया भी जाता है.

इन फिल्मों के जरिए उन्होंने कामयाबी के खोखलेपन, कलाकारों की उपेक्षा और इंसानी अकेलेपन को जिस दर्द के साथ पर्दे पर उतारा, वह अपने दौर से बहुत आगे की बात थी.

उनकी फिल्मों में परछाइयों और रोशनी का खेल, खूबसूरत क्लोज-अप्स और साहिर-कैफी के लफ़्ज़ों में ढले गाने आज भी सिनेमा की मिसाल माने जाते हैं.

मगर कैमरे के पीछे गुरु दत्त की अपनी जिंदगी बहुत उलझी हुई और तन्हा थी. काम का जुनून, टूटते रिश्ते और गहरा अवसाद उन्हें अंदर ही अंदर खा रहा था.

गुरु दत्त के संघर्ष के दिन

फिल्मी दुनिया में कदम

गुरु दत्त का मूल नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण था. उनका फिल्मों में आना कोई इत्तेफाक नहीं था. वह बचपन से ही कला के पीछे भागने वाले फनकार थे. उनका जन्म 9 जुलाई 1925 को कर्नाटक के पदुकोण में हुआ था, लेकिन बचपन कलकत्ता के माहौल में बीता. उनके परिवार की माली हालत बहुत अच्छी तो नहीं थी, लेकिन इससे बावजूद गुरु के भीतर कला को लेकर एक अजीब सी तड़प थी.

1941 में, जब गुरु दत्त महज 16 साल के थे, उन्हें मशहूर नर्तक उदय शंकर (पंडित रविशंकर के बड़े भाई) की 'इंडिया कल्चरल सेंटर' अकादमी में छात्रवृत्ति मिल गई. यहां उन्होंने शास्त्रीय और लोक नृत्य, मंच-सज्जा और भाव-भंगिमाओं की बारीकियां सीखीं.

नृत्य की इसी तालीम ने आगे चलकर गुरु दत्त के लिए सिनेमाई दृष्टिकोण की खिड़की खोल दी. 1944 में जब अकादमी बंद हुई, तो वे अपने परिवार के पास मुंबई लौट आए.

मुंबई लौटने के बाद पेट भरने के लिए उन्होंने एक ब्रिटिश फर्म (लीवर ब्रदर्स) में टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी कर ली. लेकिन 9 से 5 की यह नौकरी उनके बेचैन मन को रास नहीं आई. कुछ ही महीनों में उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी. इसके बाद उनके मामा की सिफारिश के सहारे उन्हें 1944 में पुणे के मशहूर 'प्रभात स्टूडियो' में तीन साल के अनुबंध पर काम मिला.

प्रभात स्टूडियो उन दिनों भारतीय सिनेमा में बड़ा नाम था. यहां गुरु दत्त को कोरियोग्राफर और असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर रखा गया. उन्होंने 1945 में फिल्म 'चांद' के लिए नृत्य निर्देशन किया और 'लाखारानी' (1945) और 'हम एक हैं' (1946) में सहायक निर्देशक के रूप में काम किया. यहीं उन्होंने कैमरे के पीछे की तकनीकी दुनिया—शॉट डिवीजन, लाइटिंग और एडिटिंग को बेहद बारीकी से समझा.

देव आंनद से मुलाकात

प्रभात स्टूडियो में ही गुरु दत्त की मुलाकात तब के मशहूर अभिनेता देव आनंद से हुई. दोनों की दोस्ती की शुरुआत भी बहुत रोचक है.

दरअसल, स्टूडियो के धोबी ने गलती से देव आनंद की कमीज गुरु दत्त को और गुरु दत्त की कमीज देव आनंद को दे दी. जब दोनों सेट पर एक-दूसरे की शर्ट पहने आमने-सामने आए, तो पहले तो हंसे और फिर दोनों के बीच बातचीत शुरू हो गई. यह बातचीत जल्द ही गहरी दोस्ती में बदल गई. दोनों घंटों कैंटीन में बैठकर सिनेमा और अपने सपनों पर बातें करते.

एक दिन स्टूडियो की घास पर बैठे-बैठे दोनों ने एक ऐतिहासिक वादा किया, "अगर मुझे पहले कामयाबी मिली और मैंने अपनी फिल्म कंपनी बनाई, तो तुम मेरी फिल्म डायरेक्ट करोगे और मैं हीरो का रोल करूंगा"

वह फिल्म थी 'बाज़ी'

'बाजी' जबरदस्त हिट साबित हुई. इस फिल्म से न केवल गुरु दत्त ने हिंदी सिनेमा में कदम रखा, बल्कि भारतीय फिल्मों को हॉलीवुड के 'फिल्म नॉयर' और अर्बन थ्रिलर का एक बिल्कुल नया तेवर दिया. इसी फिल्म के सेट पर उनकी मुलाकात गीता रॉय (बाद में गीता दत्त) से हुई और यहीं से गुरु दत्त के उस सुनहरे सफर का आगाज हुआ जिसने आगे चलकर 'प्यासा' और 'कागज़ के फूल' जैसी कालजयी कृतियां दीं.

'बाजी' के ही सेट पर उनकी मुलाकात गायिका गीता रॉय से हुई और उन्हें पहली नजर में ही प्यार हो गया. उस समय गीता रॉय एक प्ले बैक सिंगर के तौर पर मशहूर हो चुकी थीं. उनके पास एक लंबी गाड़ी हुआ करती थी, वो गुरुदत्त से मिलने उनके माटुंगा वाले फ्लैट पर आया करती थीं.

धीरे धीरे दोनों के प्यार परवान चढ़ा और शादी हो गई. लेकिन ये शादी बहुत दिन तक खुशहाल नहीं रह सकी. गुरु दत और गीता दत्त के रिश्ते का खाई गहरी होती चली गई.

गुरु दत्त चाहते थे कि गीता केवल उन्हीं की फिल्मों के लिए गाएं. इससे गीता को बंधा हुआ महसूस होने लगा. इसी बीच, गुरु दत्त प्यासा फिल्म की शूटिंग कर रहे थे.

तब उनकी जिंदगी में वहीदा रहमान आईं. वहीदा रहमान इस फिल्म में अभिनेत्री थी. गुरु दत्त और वहीदा के रिश्ते की खबर और लगातार होते आपसी झगड़ों से तंग आकर गीता आखिरकार बच्चों को लेकर गुरु दत्त का घर छोड़कर अलग रहने लगीं.

गुरु दत्त और वाहिदा रहमान के रिश्ते

गुरु दत्त और वहीदा रहमान की पहली मुलाकात हैदराबाद में हुई थी. तब गुरु दत्त अपनी फिल्म 'सीआईडी' के लिए एक नए चेहरे की तलाश में थे. वहीदा की खूबसूरती, सादगी और बेहतरीन अभिनय क्षमता से प्रभावित होकर गुरु दत्त उन्हें मुंबई ले आए और साल 1956 में अपनी फिल्म 'सीआईडी' से उन्हें लॉन्च किया.

इसके बाद गुरु दत्त ने 'प्यासा' (1957) और 'कागज के फूल' (1959) में वहीदा को कास्ट किया. कैमरे के पीछे काम करते-करते गुरु दत्त वहीदा रहमान के करीब आ गए.

हालांकि गीता दत्त के साथ उनकी शादी की वजह से ये रिश्ता कभी परवान नहीं चढ़ सका. लेकिन कहा जाता है कि गुरु दत्त ने कई फिल्मों के जरिए अपने प्रेम और उलझन को दिखाया है.

'प्यासा' फिल्म में वाहिदा रहमान

'प्यासा' फिल्म में वाहिदा रहमान

एक बार गुरु दत्त को एक चिट्ठी मिली. इसमें वाहिदा रहमान का साइन था. इसपर लिखा था, 'मैं आपसे एक बेहद निजी और अहम मसले पर बात करना चाहती हूं. क्या आप कल रात 9 बजे इरोज में आएंगे? मैं आपका इंतज़ार करूंगी. यह सचमुच बेहद जरूरी है.'

'मैं आपसे एक बेहद निजी और अहम मसले पर बात करना चाहती हूं. क्या आप कल रात 9 बजे इरोज में आएंगे? मैं आपका इंतज़ार करूंगी. यह सचमुच बेहद जरूरी है.'

अगले दिन रात 9 बजे गुरु बताए गए स्थान पर गए और कुछ देर इंतजार करते रहे लेकिन कोई नहीं आया. वे तुरंत गीता के सांताक्रूज़ वाले मकान की तरफ चल दिए और गीता के बारे में पूछने लगे.

गीता की मां उन्हें इतनी रात को आया देखकर चौंक गई. उन्होंने बताया कि गीता दोपहर में आई थी लेकिन जल्दी ही फिर निकल गई थी. गुरु दत्त जानते थे कि गीता पाली हिल वाले बंगले पर नहीं है. वे नाराज हुए.

बिछड़े सभी बारी-बारी...

वाहिदा रहमान अच्छे से जानती थीं कि गुरु दत्त के साथ आगे बढ़ना इतना आसान नहीं है. और तो और वो किसी का घर बर्बाद नहीं करना चाहती थी.

फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम'के बाद दोनों के बीच की दूरियां इतनी बढ़ गईं कि उन्होंने पेशेवर तौर पर भी साथ काम करना बंद कर दिया.

फिल्म 'कागज के फूल' को लेकर कहा जाता है कि ये फिल्म गुरु दत्त के मन में चल रही अधूरी कसक का ही नतीजा था.

एक बार तो ये अफवाह तक फैल गई थी कि गुरु दत्त वाहिदा रहमान से शादी करने के लिए मुसलमान बन रहे हैं. इस अफवाह को जैसे तैसा समेटा गया.

यासिर उस्मान ने अपनी किताब में लिखा है, इस घटना के बाद जॉनी वॉकर कहा करते थे, 'स्टूडियो के दरवाज़े और घर के दरवाज़े में जितना फासला रखोगे, सुखी रहोगे. नहीं तो घर में काम की बातें होंगी और स्टूडियो में घर की बातें होंगी. तुम कन्फ्यूज़ हो जाओगे कि तुम आ रहे हो या जा रहे हो.

और तुम्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी और ये कीमत बहुत ज़्यादा होती है. इसे कोई अफोर्ड नहीं कर सकता.'

गुरु दत्त के जिदंगी के आखिरी दिनों में ऐसा हुआ भी, वो जिन लोगों को अपने आसपास चाहते थे, वे शायद उनसे दूर होते चले गए. गुरु दत्त का फिल्म का गाना 'बिछड़े सभी बारी-बारी' ऐसा लगता है उनपर ही लिखा गया हो.

गुरु दत्त की फिल्म 'प्यासा' का फेमस सीन

गुरु दत्त की फिल्म 'प्यासा' का फेमस सीन

गुरु दत्त की फिल्में

1957 में आई प्यासा को गुरु दत्त की सबसे प्रभावशाली फिल्मों में गिना जाता है. इसका नायक विजय एक कवि है, जिसे अपनी जिंदगी में वह सम्मान नहीं मिलता जिसकी उसकी रचनाएं हकदार हैं.

लेकिन जब दुनिया उसे मृत समझने लगती है, तब उसकी कविता की कीमत अचानक बढ़ जाती है.
विजय की दुनिया में कविता, प्रेम और मानवीय गरिमा का सामना बाजार की मांग, स्वार्थ और सामाजिक पाखंड से होता है.

यही वजह है कि प्यासा केवल एक असफल कवि की प्रेम कहानी नहीं रह जाती. कहा जाता है कि प्यासा को लेकर गुरु दत्त बेहद जुनूनी थे.

फिल्म में साहिर लुधियानवी की नज्म 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' को गाया गया है. ये गाना भी अपने आप में एक कल्ट है.

गुरु दत्त ने यूं तो कई फिल्में बनाई. लेकिन उनकी एक और फिल्म'कागज के फूल' (1959) गुरु दत्त ने तब बनाया था जब वे जिंदगी के सबसे अशांत और बुरे दौर में किया था.

उन दिनों उनकी शादीशुदा जिंदगी बिखर रही थी और पत्नी गीता दत्त के साथ गहराते विवादों व अभिनेत्री वहीदा रहमान से अपनी बढ़ती नजदीकियों के कारण वे भयंकर मानसिक अवसाद से जूझ रहे थे.

इसी अकेलेपन और निराशा को समेटकर उन्होंने भारत की पहली सिनेमास्कोप फिल्म बनाने का बड़ा तकनीकी जोखिम लिया, जो असल में उनके अपने ही भविष्य की एक डरावनी भविष्यवाणी जैसी थी.

इस फिल्म को इसके विजुअल मास्टरपीस के लिए भी जाना जाता है. लेकिन यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बेहद बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई थी.

कागज़ के फूल के मशहूर गीत ‘वक्त ने किया क्या हसीन सितम’ के बनने के पीछे एक दिलचस्प किस्सा है. अभिनेत्री शबाना आजमी ने अपने पिता और गीतकार कैफी आजमी से जुड़ा यह किस्सा साझा किया था.

एस.डी. बर्मन ने धुन बनाई थी और कैफी आजमी ने उस पर गीत का मुखड़ा लिखा था. जब गुरु दत्त ने इसे सुना, तो उन्हें यह इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे फिल्म में शामिल करने की इच्छा जताई. परेशानी यह थी कि उस वक्त फिल्म में इस गाने के लिए कोई उपयुक्त सिचुएशन नहीं थी. लेकिन गुरु दत्त पीछे हटने को तैयार नहीं थे.

उन्होंने कहा कि पूरा गाना तैयार कीजिए, सिचुएशन वह खुद बना लेंगे. इस तरह एक ऐसा गीत फिल्म का हिस्सा बना, जिसकी जरूरत पहले कहानी में मौजूद ही नहीं थी.

और... एक फनकार ने दुनिया छोड़ दी..

9 अक्टूबर 1964. मुंबई के पेडर रोड का एक घर. रात में लेखक अबरार अल्वी फिल्म 'बहारें फिर भी आएंगी' के आखिरी सीन पर काम कर रहे थे.

उन्होंने सीन गुरु दत्त को सुनाया. गुरु ने ध्यान से सुना लेकिन चुप रहे. अबरार ने पूछा, आपको पसंद आया?' जवाब देर से आया, 'तुम जानते हो अबरार, मुझे डर है कि किसी दिन मैं पागल हो जाऊंगा. तन्हाई सचमुच बेरहम हो सकती है.'

इसके बाद वो उठे और रात करीब 12:30 बजे पड़ोसी के घर से राज कपूर को फोन किया. उन्होंने पूछा कि क्या वे अभी आकर मिल सकते हैं. राज कपूर को हैरानी हुई.

उन्होंने कहा कि अभी बहुत रात हो गई है, कल शाम को मिलने का वादा किया. गुरु दत्त उन्हें अपनी पसंदीदा फिल्म 'कागज़ के फूल' दिखाना चाहते थे, उस पर बात करना चाहते थे. वो फिल्म जो बॉक्स ऑफिस पर असफल रही थी, लेकिन उनकी आत्मा से कभी अलग नहीं हुई.

करीब तीन बजे रात को वे बाहर आए. अस्सिटेंट रतन को जगाया और अबरार के बारे में पूछा.

रतन ने बताया कि वे डिनर के बाद चले गए थे. उसने पूछा कि क्या उनके लिए ड्रिंक बनाए. गुरु ने कहा- नहीं, सिर्फ बोतल दे दो. रतन ने उन्हें व्हिस्की की बोतल दी और वे चुपचाप अपने कमरे में लौट गए. इस बार भी दरवाजा अंदर से बंद हो गया.

फिल्म 'कागज के फूल'

फिल्म 'कागज के फूल'

अगली सुबह, 10 अक्टूबर को उनका शरीर कमरे में मिला. बिस्तर पर लेटे हुए, आंखें अधखुली, दाहिना हाथ फैला हुआ, दाहिना पैर थोड़ा मुड़ा हुआ, जैसे वे उठना चाह रहे हों. पास में एक अधूरी किताब रखी थी. गिलास में कुछ रंगीन तरल था- न सादा पानी, न पूरी शराब.

क्रेडिट्स

डेवलपर- चंदन सिंह राजपूत
कंटेट सोर्स- किताब 'गुरु दत्त: एक अधूरी कहानी', 'गुरु दत्त- अ लाइफ इन सिनेमा' , इलस्ट्रेशन- चंदन सिंह राजपूत
रिसर्च- चंदन सिंह राजपूत, आकाश मिश्रा