नरेंद्र दामोदर दास मोदी...12 अक्षर, 6 मात्राएं और 1 अनुस्वार वाला ये नाम 21वीं सदी की भारतीय राजनीति का सबसे कद्दावर नाम है. पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में और फिर देश के प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी सत्ता के शिखर पर 25 साल पूरे कर चुके हैं. देश ही नहीं बल्कि दुनिया की सबसे चर्चित राजनीतिक हस्तियों में से एक पीएम मोदी का आज यानी 17 सितंबर 2026 को 76वां जन्मदिन भी है.

इस मौके पर ये देखना बनता है कि गुजरात के वडनगर के एक सामान्य परिवार में जन्मा बाल नरेंद्र कैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का शिखरपुरुष बन गया. ये कहानी बेहद उतार-चढ़ाव भरी है. ये सफर कैसे तय हुआ? किन पड़ावों से गुजरा और कैसे पिछले ढाई दशक की राजनीति में मोदी नाम अजेय बना हुआ है आइये देखते हैं...

वडनगर... जहां बीता बचपन

नरेंद्र मोदी की यात्रा वडनगर की गलियों से शुरू होती है. उत्तरी गुजरात के मेहसाणा का छोटा सा कस्बा. आजादी के तीन साल बाद 17 सितंबर 1950 को दामोदर दास मोदी और हीरा बा के घर पर उनका जन्म हुआ. नरेंद्र छह संतानों में से तीसरी संतान थे.

नरेंद्र मोदी का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जिसे दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था. पूरा परिवार सिर्फ 40 बाय 12 के एक छोटे से घर में रहता था. पिता दामोदर दास वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय की दुकान चलाते थे.

वडनगर में ही नरेंद्र मोदी की स्कूली शिक्षा हुई. वे लाइब्रेरी में घंटों बिताते. उन्हें तैराकी का भी शौक था. लेकिन परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी. इसलिए पिता की चाय की दुकान पर जाकर हाथ भी बंटाते थे.

सपना था- सेना में जाएं और देश की सेवा करें

नरेंद्र मोदी एक ऐसे समाज और माहौल में पले-बढ़े, जिसने उनके जीवन को बहुत प्रभावित किया. युवावस्था में ही उनका झुकाव त्याग और तप की ओर बढ़ रहा था. उन्होंने नमक, मिर्च, तेल और गुड़ खाना छोड़ दिया.

यह वही दौर था जब एक बालक के तौर पर नरेंद्र मोदी ने एक सपना देखा. सपना था सेना में जाकर देश की सेवा करने का. लेकिन परिवार इसके खिलाफ था. नरेंद्र मोदी जामनगर के पास सैनिक स्कूल में पढ़ना चाहते थे, लेकिन पिता की माली हालत ऐसी नहीं थी कि स्कूल की फीस भर सकें.

सैनिक की वर्दी पहनकर भारत की सेवा करने का जो सपना उन्होंने देखा था, वह टूट गया. लेकिन कहते हैं न कि किस्मत में जो लिखा होता है, वही होता है. नरेंद्र मोदी के साथ भी ऐसा ही हुआ.

...और छोड़ दिया घर

बचपन से ही स्वामी विवेकानंद की किताबें पढ़कर नरेंद्र मोदी आध्यात्म की ओर बढ़े. और फिर 17 साल की उम्र में उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने उनके जीवन को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया.

17 बरस की उम्र में नरेंद्र मोदी ने घर छोड़ने और देशभर में घूमने का फैसला लिया. उनका परिवार इस फैसले से हैरान था, लेकिन जिद्दी नरेंद्र के आगे परिवार को झुकना पड़ा.

जब घर छोड़ने का समय आया तब उनकी मां ने उन्हें मिठाई खिलाई, माथे पर तिलक लगाया और घर से विदा किया.

नरेंद्र ने जिन जगहों की यात्राएं कीं, उनमें हिमालय भी है जहां वह गुरुदाचट्टी में ठहरे. पश्चिम बंगाल में रामकृष्ण आश्रम की यात्रा की. पूर्वोत्तर भारत का भी दौरा किया. इन यात्राओं ने उनके जीवन पर गहरा असर डाला.

घर वापसी और फिर RSS प्रचारक

अपनी यात्रा पूरी कर दो साल बाद नरेंद्र घर लौट आए. लेकिन दो हफ्ते ही रुके. इसके बाद उनका लक्ष्य साफ था और वह था अहमदाबाद जाना. वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ने का मन वे बना चुके थे.

आरएसएस से उनका पहला परिचय 8 साल की उम्र में ही हो गया था. वडनगर में जब वह अपने पिता की चाय की दुकान पर जाकर हाथ बंटाते थे, तब वहां आरएसएस से जुड़े युवा भी आते थे. इन बैठकों में नरेंद्र मोदी भी चले जाया करते थे. इसी दौरान वह लक्ष्मणराव इनामदार से मिले, जिनको 'वकील साब' के नाम से भी जाना जाता था. लक्ष्मणराव इनामदार ने नरेंद्र मोदी के जीवन पर काफी गहरा प्रभाव डाला था.

खैर, लगभग 20 साल की उम्र में नरेंद्र मोदी अहमदाबाद पहुंचे. यहां वह आरएसएस से जुड़े. 1972 में वह आरएसएस के प्रचारक बन गए और पूरा समय आरएसएस को देने लगे.

एक प्रचारक के तौर पर वह कठोर दिनचर्या का पालन करते थे. दिन की शुरुआत सुबह 5 बजे होती थी जो देर रात तक चलती थी. इस तरह की एक व्यस्त दिनचर्या के बीच नरेंद्र मोदी ने राजनीति विज्ञान में अपनी डिग्री पूरी की.

आपातकाल के काले दिन

25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया. संवैधानिक अधिकार खत्म कर दिए गए. अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जॉर्ज फर्नांडिज जैसे विपक्षी नेताओं को पकड़कर जेल में डाल दिया गया.

कुछ दिन बाद ही इंदिरा गांधी की सरकार ने आरएसएस पर भी बैन लगा दिया. आरएसएस के स्वयंसेवकों को अंडरग्राउंड होकर, छिप-छिपाकर अपना काम करना पड़ा. नरेंद्र मोदी भी उनमें से एक थे.

आपातकाल में कठोर सेंसरशिप थी. हर चीज पर सरकार की नजर होती थी. ऐसे में नरेंद्र मोदी गुप्त बैठकें किया करते थे. उन्होंने उस दौर में सूचना फैलाने के लिए रेलवे नेटवर्क का इस्तेमाल किया. नरेंद्र मोदी अपने साथी स्वयंसेवकों के साथ मिलकर गुजरात से जाने वाली ट्रेनों में कांग्रेस सरकार की ज्यादतियों से जुड़ी सामग्री रखते थे, ताकि संदेश कम से कम जोखिम में दूर-दराज के इलाकों तक चला जाए.

आरएसएस प्रचारक और आपतकाल विरोधी होने के नाते उनके ऊपर कई जिम्मेदारियां थीं.

कभी-कभी अपने काम के चलते उन्हें अपना हुलिया भी बदलना पड़ता था. हुलिया बदलने और घुलने-मिलने में वह इतने माहिर थे कि उनके परिचित भी उन्हें पहचान नहीं पाते थे. कभी वह भगवा वस्त्र पहने साधु-संत बन जाते तो कभी सिख की वेशभूषा में आ जाते तो कभी दाढ़ी वाले बुजुर्ग बन जाते.

वेश बदल-बदलकर नरेंद्र मोदी ने आपातकाल के दौरान कई बार पुलिस को चकमा दिया. आपातकाल में उनके साथ रहे रोहित अग्रवाल बताते हैं, 'नरेंद्र काका, सरदार जी का वेश बनाकर पुलिस को चकमा देकर बचते रहे.'

वह बताते हैं, '1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था, नरेंद्र काका उस समय हमारे घर मधु कुंज में सरदारजी के वेश में हमारे साथ रह रहे थे. एक बार वह सरदार जी के वेश में बाहर निकल ही रहे थे तभी पुलिस पहुंच गई और उनसे पूछा- नरेंद्र मोदी कहां रहते हैं? मोदी ने जवाब दिया- मुझे नहीं पता. आप अंदर जाकर पूछ सकते हैं. जब पुलिस घर के अंदर गई तब तक वह मेरे भाई के साथ स्कूटर पर बैठकर वहां से चले गए. सिर्फ पुलिस ही नहीं, बल्कि हम भी नरेंद्र मोदी की शक्ल से धोखा खा जाते थे.'

ये आपातकाल ही था, जिसने नरेंद्र मोदी को 'नेता' के तौर पर स्थापित किया. आपातकाल खत्म होने के बाद 1978 में नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली किताब 'संघर्ष मा गुजरात' लिखी, जो आपातकाल के दौरान उनके अनुभवों का संस्मरण है. उन्होंने यह किताब सिर्फ 23 दिन में लिख ली थी.

नरेंद्र मोदी और बीजेपी

आपातकाल के बाद नरेंद्र मोदी की जिम्मेदारियां और बढ़ीं. आरएसएस ने उन्हें संभाग प्रचारक बनाया. उन्होंने गुजरात के हर गांव का दौरा किया. लोगों की परेशानियां जानीं. सूखा, बाढ़ या दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी हमेशा सक्रिय रहते और लोगों की मदद किया करते थे.

एक तरफ नरेंद्र मोदी अपने काम में डूबे हुए थे तो दूसरी तरफ आरएसएस और भाजपा उन्हें और ज्यादा जिम्मेदारियां सौंपना चाहते थे. इस तरह से 1987 में उनके जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ. नरेंद्र मोदी आरएसएस से भाजपा में आए.

यह वडनगर के एक बालक की लंबी छलांग थी. लेकिन जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी. भाजपा नई-नई बनी थी और तब कांग्रेस के अलावा और कोई खास विकल्प नहीं था. अब गुजरात भाजपा की जिम्मेदारी उनके हाथ में ही थी.

नरेंद्र मोदी और 'एकता यात्रा'

11 दिसंबर 1991 को मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने 'एकता यात्रा' शुरू की. यह यात्रा कन्याकुमारी से कश्मीर तक निकाली जानी थी. यह यात्रा ऐसे समय पर हुई थी, जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था.

गुजरात के भाजपा नेता जगदीश द्विवेदी याद करते हैं, 'यह वह समय था जब कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था, और वह नरेंद्र मोदी ही थे जिन्होंने तब इस यात्रा का विचार किया और इसे साकार किया.'

उन्होंने कहा, 'एक ओर, कश्मीर में आतंकवादी यात्रा पर हमला कर रहे थे और इसे आगे न बढ़ने की धमकी दे रहे थे. दूसरी ओर, पंजाब में भी आतंकवादियों ने यात्रा को विफल करने के लिए उस पर हमला किया. फिर भी, नरेंद्र मोदी ने आगे बढ़कर नेतृत्व किया और सुनिश्चित किया कि यात्रा के 'रथ' कश्मीर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने के लिए पहुंचें.'

यह यात्रा 14 राज्यों से होकर गुजरी और 26 जनवरी 1992 को श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने के साथ खत्म हुई.

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी

1987 में नरेंद्र मोदी जब भाजपा में आए तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अहमदाबाद के स्थानीय चुनाव थे. इस चुनाव में नरेंद्र मोदी ने जमकर प्रचार किया और भाजपा को जीत दिलाई.

फिर 1990 का गुजरात विधानसभा चुनाव आया. भाजपा 67 सीटों पर जीती और गठबंधन की सरकार बनी. 1995 में भाजपा ने 182 में से 121 सीटें जीतीं और पहली बार राज्य में अपने दम पर सरकार बनाई.

ये नरेंद्र मोदी की काबिलियत ही थी कि इस चुनाव के बाद उन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाकर दिल्ली बुला लिया गया. 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में उनकी अहम भूमिका थी.

फिर आया वह दिन, जिसने नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी बना दिया. 30 सितंबर 2001 को माधवराव सिंधिया का एक विमान हादसे में निधन हो गया. इस विमान में सीनियर कैमरामैन गोपाल बिष्ट भी थे. उस दिन नरेंद्र मोदी इन्हीं गोपाल बिष्ट के अंतिम संस्कार में मौजूद थे, तभी उनके पास प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का फोन आया.

अटल जी ने पूछा, 'भई कहां हो?'

मोदी ने कहा, 'मैं शमशान में हूं.'

इस पर अटल जी ने कहा, 'तुम शमशान में हो, मैं तुमसे अब क्या बात करूं?'

लेकिन उन्होंने मोदी को अपने आवास पर मिलने के लिए शाम को बुलाया. जब मोदी शाम को मिलने पहुंचे तो अटल जी ने कहा, 'दिल्ली ने तुम्हें बहुत मोटा बना दिया है! तुम्हें गुजरात वापस जाना चाहिए!'

नरेंद्र मोदी उनका इशारा अच्छी तरह समझ गए थे. लेकिन वह खुद इससे हैरान थे. जो कभी विधायक भी न बना हो, उस पर पार्टी इतनी बड़ी जिम्मेदारी देने का भरोसा कर रही थी. लेकिन जब प्रधानमंत्री खुद इस बात के लिए जोर दे रहे हों, तो कौन इनकार कर सकता था?

नरेंद्र मोदी गुजरात आए और 7 अक्टूबर 2001 को पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. इस तरह नरेंद्र मोदी की गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पारी शुरू हुई.

गुजरात के दंगे

मुख्यमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी 24 फरवरी 2002 को राजकोट-2 विधानसभा सीट से उपचुनाव जीते. 27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के S-6 कोच में आग लगी और 59 कारसेवकों की मौत हो गई.

इस घटना के बाद गुजरात में दंगे भड़क गए. भीड़ ने कानून अपने हाथ में ले लिया. लोगों को घरों से निकाल-निकालकर मारा गया. सड़कों पर ऐसा कत्लेआम मचा, जैसा गुजरात ने पहले कभी नहीं देखा था. कहीं पूरी बस्तियां जल रही थीं तो कहीं सड़कों पर इंसानों को जिंदा जलाया जा रहा था. इन दंगों में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे.

गुजरात दंगों ने नरेंद्र मोदी के विरोधियों को सिर उठाने का मौका दे दिया. भाजपा में भी एक धड़ा ऐसा था जो नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाना चाहता था. मार्च 2004 में लालकृष्ण आडवाणी ने खुद गुजरात दंगों को 'धब्बा' बताया था. आडवाणी तब उप-प्रधानमंत्री थे.

दंगों के कई सालों बाद तक भाजपा के असंतुष्ट नेताओं ने आडवाणी को चिट्ठी लिखकर मोदी को हटाने की मांग की थी.

आडवाणी ने 2018 में एक लेख में बताया था कि गुजरात दंगों के बाद मोदी इस्तीफा देने के लिए तैयार थे. उन्होंने लिखा था, 'मैंने वाजपेयी जी से कहा था अगर इस्तीफे से स्थिति सुधरती है तो इस्तीफा तुरंत लिया जाना चाहिए. मेरा मानना था कि इससे स्थिति नहीं सुधरेगी. जब मैंने मोदी से कार्यकारिणी बैठक में इस्तीफा देने पर बात की तो वह तुरंत तैयार हो गए थे.'

गुजरात दंगों का हवाला देते हुए ही मार्च 2005 में अमेरिका ने नरेंद्र मोदी को वीजा देने से भी मना कर दिया था. 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार की एक वजह भी गुजरात दंगे और नरेंद्र मोदी को न हटाना माना गया. अटल बिहारी वाजपेयी ने खुद एक बार कहा था कि दंगों के बाद नरेंद्र मोदी को न हटाना बड़ी गलती थी.

एक तरफ गुजरात दंगों के बाद भाजपा के कई नेताओं को नरेंद्र मोदी खटकने लगे थे तो दूसरी तरफ उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी थी. दंगों से पहले फरवरी 2002 में मोदी 14,700 वोटों के अंतर से जीते थे. जबकि, दंगों के बाद दिसंबर 2002 में जब विधानसभा चुनाव हुए तो मोदी 75,331 वोटों के अंतर से जीते. उसके बाद 2007 और 2012 के चुनाव में भी मोदी की जीत का अंतर 85 हजार से ज्यादा था.

'मैं नरेंद्र दामोदर दास मोदी'

13 सितंबर 2013... यह वह तारीख है जब मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनने का सफर शुरू हो गया.

इस दिन दिल्ली में भाजपा की संसदीय बोर्ड की बैठक हुई. बैठक में लालकृष्ण आडवाणी नहीं थे. उस वक्त ऐसी चर्चाएं थीं कि नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी को लेकर आडवाणी नाराज हैं. लेकिन बैठक हुई और फैसला लिया गया कि 2014 में भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी होंगे.

शाम को भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा, 'भाजपा हमेशा अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करती रही है. संसदीय बोर्ड की बैठक भी इसलिए बुलाई गई थी और बोर्ड ने फैसला किया है कि नरेंद्र मोदी को 2014 के चुनाव के लिए भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाए.'

नरेंद्र मोदी जिस दिल्ली से गुजरात वापस गए थे, अब वापस वहीं लौट रहे थे. 2014 के चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ जबरदस्त नाराजगी थी. यह वह दौर था जब देश में 'मोदी लहर' चली. 'अच्छे दिन आने वाले हैं' और 'जनता माफ नहीं करेगी' जैसे विज्ञापनों ने नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और बढ़ा दी. नरेंद्र मोदी के 'गुजरात मॉडल' में जनता को एक उम्मीद दिखी. और यही उम्मीद भाजपा की जीत का कारण बनी.

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले अपने दम पर 282 सीटें जीतीं. एनडीए के पास 336 से ज्यादा सीटें थीं. 10 साल तक सत्ता में रही कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई. भारतीय इतिहास में यह पहली बार था जब कोई गैर-कांग्रेसी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई. और 16 मई 2014 को नरेंद्र मोदी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने.

2014 की जीत के बाद नरेंद्र मोदी अब सिर्फ एक नेता नहीं रह गए थे, बल्कि एक 'ब्रांड' बन गए. एक ऐसा ब्रांड जो भाजपा की जीत की गारंटी बना. नरेंद्र मोदी के चेहरे पर भाजपा ने कई राज्यों में सरकारें बनाईं.

2019 के चुनाव में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और बढ़ी. इस बार उनके चेहरे पर भाजपा अपने दम पर 303 सीटें लेकर आई. एनडीए के खाते में 353 सीटें आईं. कांग्रेस के बाद भाजपा पहली ऐसी पार्टी बनी, जिसे लोकसभा चुनाव में 300 से ज्यादा सीटें मिलीं. 2019 की जीत के बाद ही जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाया गया. उसी साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर के हक में फैसला सुनाया.

हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में 'ब्रांड मोदी' को तब बड़ा झटका लगा, जब भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई. लेकिन सहयोगियों के दम पर नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने में कामयाब रहे. 9 जून 2024 को उन्होंने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.

2024 के चुनाव में भाजपा को भले ही झटका लगा हो लेकिन बाद के विधानसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के ही चेहरे पर पार्टी ने कई राज्यों में सरकार बनाई.

नरेंद्र मोदी आज 76 साल के हो गए हैं. और इतनी उम्र हो जाने के बाद भी वह हर वर्ग में लोकप्रिय हैं. चाहे भाजपा हो या कोई और राजनीतिक पार्टी, किसी के पास आज भी ऐसा चेहरा नहीं है जो नरेंद्र मोदी का मुकाबला कर सके.